Friday, December 21, 2012

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:   जल ही जीवन है भारतीय दर्शन , विज्ञान , साहित्य , व धर्म मे किसी विषय संदर्भ या शब्द को समझाने के लिए किसी उपमा के साथ जोड़ कर उ...

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1980 - 90 के दशक मे पंजाब ने उग्रवाद केरूप मे भीष...
: 1980 - 90 के दशक मे पंजाब ने उग्रवाद के रूप मे भीषण त्रासदी को झेला है | राष्ट्रवाद के इस संघर्ष मे संघ के बहुत से कार्यकर्ताओं ने ...

1980 - 90 के दशक मे पंजाब ने उग्रवाद के रूप मे भीषण त्रासदी को झेला है |
राष्ट्रवाद के इस संघर्ष मे संघ के बहुत से कार्यकर्ताओं ने अपना बलिदान दिया |
समाज एवं कार्यकर्ताओं का मनोबल बना रहे इसके लिए संघ के अधिकारी व भाजपा नेता अपनी जान की परवाह  ना करते हुए सतत प्रयास रत रहे |
जैतो से संघ के वरिष्ठ व समर्पित स्वयंसेवक व भाजपा के प्रान्त सचिव डा. धर्मवीर सिंह भाटिया भी 23 दिसम्बर 1990  को उग्रवाद के साथ संघर्ष करते हुए आतंकवादियों की गोली का शिकार हुए थे |
जैतो मे डा. भाटिया के बलिदान दिवस पर  हर वर्ष श्रद्धांजली के रूप मे आयुर्वेद एवं समसामयिक विषय पर कार्यक्रम आयोजित किया जाता है | आयुर्वेद से संबंधित इस से पूर्व राष्ट्रीय आयुर्वेद छात्र निबन्ध लेखन प्रतियोगिता का आयोजन लगातार तीन वर्ष किया था जिसमे देश भर के कई राज्यों यथा महाराष्ट्र गुजरात बिहार उत्तरप्रदेश राजस्थान हरियाणा पंजाब आदि से प्रविष्टियाँ प्राप्त हुई व जैतो मे पुरस्कार वितरण समारोह हुए | इस वर्ष समसामयिक विषयों पर एक व्याख्यान माला शुरू की जा रही है जिसमे प्रथम माला के मुख्यवक्ता के  रूप मे
श्री ओमप्रकाश उपाध्याय जी ,
उपकुलपति,  गुरु रविदास आयुर्वेद विश्वविद्यालय ,होशियारपुर
आने वाले हैं |  इस बार का विषय है ____
आधुनिक जीवनशैली एवं पर्यावरण संकट मे आयुर्वेद एक आशा की किरण 
कार्यक्रम की अध्यक्षता
श्री कमल शर्मा , राजनीतिक सलाहकार मुख्यमंत्री पंजाब करेंगे
नित्य नवीन वैज्ञानिक अनुसंधानों के द्वारा व्यक्ति का जीवन सरल सुगम व आरामदायक होता जा रहा है |इसके अनेकोनेक फायदे तो हैं ही परन्तु कुछ नए प्रकार के खतरे व नुकसान भी हैं
अल्पश्रम , सुविधाजनक आवागमन , रहनसहन , बिना प्रयास किये सर्वसुलभ फास्ट फ़ूड व प्रोसेस्ड फ़ूड के अतिरिक्त संचार माध्यम , टीवी मोबाइल इंटरनेट आदि ने मानव जीवन को सुखद तो बनाया ही है परन्तु इससे मानव जीवन पर विपरीत परिणाम भी हो रहे हैं | पर्यावरण भी प्रदूषित हो रहा है एवं दूषित पर्यावरण के कारण फिर मानव जीवन एवं अन्य प्राणियों पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं | कई जीव तो विलुप्त होने के कागार पर हैं |
खेती मे  रासायनिक खादों व कीटनाशकों के अत्यधिक प्रयोग से भयावह परिणाम सामने आ रहे हैं | समूचा पंजाब कैंसर ग्रस्त है | भूमिगत पानी तक विषाक्त हो चुका है |खेतों मे रसायनों कीटनाशकों व खरपतवार नाशकों के प्रयोग से आयुर्वेदिक वनौषधियाँ भी दूषित हो चुकी हैं व कई वनौषधियां तो विलुप्त हो रही हैं |
अभी हाल ही मे मल्टीनेशनल कम्पनियों द्वारा GM Food ( जेनिटिकली मोडिफाइड फ़ूड ) के नाम से एक नई समस्या दस्तक दे रही है | जी एम् टेक्नोलोजी के कारण समूचे पेड़ पौधे व जीव जंतुओं पर तो व्यापक प्रभाव पडेगा ही अपितु आयुर्वेदिक वनौषधियों पर भी संकट आने वाला है | इससे वनौषधियों के गुण धर्म बदल जायेंगे |
आज भी वनौषधियों के रस गुण वीर्य विपाक प्रभाव को जानने के लिए हमे प्राचीन आयुर्वेद ग्रंथों का ही सहारा लेना पड़ता है | भारत से बाहर की वनौषधियां जो पूर्व मे यहाँ प्रचलन मे नहीं थी उनके रस गुण वीर्य विपाक प्रभाव को जानने की कोई वैज्ञानिक विधि हमने विकसित नहीं की जिस कारण संपूर्ण आयुर्वेद जगत उनके गुण धर्म के विषय मे एक मत नहीं हो पाता तो जी एम् के कारण पहले से ज्ञात औषधियों के परिवर्तित गुण धर्म कैसे जान पाएंगे ? और बिना जाने प्रयोग करेंगे तो लाभ की जगह हानि भी हो सकती है | B T Cotton   का उदाहरण सामने है ) 
इस संबंध मे आयुर्वेद जगत की चुप्पी न केवल हैरानी जनक  है अपितु पीड़ादायक भी है |
आयुर्वेद का मूर्धन्य विद्वान होने के नाते इन समस्याओं पर ओमप्रकाश उपाध्याय जी का  उचित मार्ग दर्शन अपेक्षित है |


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Saturday, August 4, 2012



 जल ही जीवन है
भारतीय दर्शन , विज्ञान , साहित्य , व धर्म मे किसी विषय संदर्भ या शब्द को समझाने के लिए किसी उपमा के साथ जोड़ कर उसका अर्थ समझाने का प्रयास किया जाता है |
ऐसे ही हमारे धर्म विज्ञान दर्शन व साहित्य मे विद्वानों ने जल को जीवन के साथ जोड़ कर कह दिया है .........
जल ही जीवन है
यूँ तो हम कई जगह पढते हैं कि यह शरीर पांच तत्व/ पंचमहाभूत ( आकाश वायु अग्नि जल व पृथ्वी ) से मिल कर बना है | आत्मा के संयोग से यह जीवनीय होता है | फिर क्या बात है कि इन पांच तत्व और छटा आत्मा , मे से केवल जल को ही चुना और कह दिया ________
जल ही जीवन है
और यह बार बार और हर क्षेत्र में कहा गया है |किसी ने भी यह क्यों नहीं कहा ___आत्मा ही जीवन है , पृथ्वी ही जीवन है , आकाश /वायु/ अग्नि ही जीवन है
प्रतीक रूप मे जल को ही जीवन की संज्ञा क्यों ....?
 हिंदू धर्म वास्तव में एक वैज्ञानिक धर्म है | हमारे धार्मिक ग्रथों से लेकर हमारे साहित्य , दर्शन , ज्योतिष शास्त्र , समाज शास्त्र एवं विज्ञान और स्वास्थ्य विज्ञान ( आयुर्वेद ) में भी किसी भी विषय को समझाने के लिए प्रतीकों का प्रयोग बहुतायत से किया जाता है | और इन प्रतीकों का कोई ठोस व तार्किक पक्ष अवश्य ही इनसे जुड़ा होता है |
यही कारण है कि मेरे मन मे यह प्रश्न उठा कि
जल ही क्यों जीवन है ?
हम पांच तत्व और आत्मा के बारे मे विचार भी करें कि क्या इन्हें जीवन कह सकते हैं ?
जीवन के साथ कुछ विशेषण भी जोड़े जाते हैं जैसे जीवन चक्र ______जीवन ....चलने का नाम
यानि ....जीवन कभी रुकता नहीं सदा गतिमान है और इस मृत्युलोक मे जीवन की स्वाभाविक परिणिति मृत्यु है |
लेकिन मृत्यु के साथ जीवन समाप्त नहीं होता , मृत्यु के बाद भी जीवन चलता है |
तभी इसे जीवन चक्र की संज्ञा दी गयी है |अर्थात ....जहाँ से चले फिर वहीँ पहुँच गए |
अब क्या पञ्च तत्व और आत्मा जीवन के चलायमान होने और जीवन के चक्र होने की शर्त पूरा करते हैं ?
पृथ्वी को ही लें | पृथ्वी सदा गतिमान है |स्वयं अपनी धुरी पर चलती है और एक दिन मे चक्र पूरा करती है एवं एक वर्ष में सूर्य का एक चक्र पूरा कर लेती है
फिर ..!! पृथ्वी ही जीवन है” .............क्यों नहीं ?
वायु भी सदा चलती है | इतना ही नहीं वायु के बिना तो जीवन की कल्पना असंभव लगती है | व्यक्ति जल के बिना तो शायद कुछ देर जीवित रह ले परन्तु सांस( वायु ) लिए बिना तो एक पल भी जीवित नहीं रह सकता |
पित्तं पंगु कफः पंगु पंगवः मलधातवः
वायुना यत्र नीयन्ते तत्र गच्छन्ति मेघवत्
फिर  
वायु ही जीवन है ..............क्यों नहीं ?
ऐसे ही अग्नि _ अग्नि है तो ऊर्जा  है
ऊर्जा है तो गति है .......गति है तो जीवन है | पृथ्वी जल वायु , आकाश आदि तत्व भी बिना ऊर्जा के व्यर्थ हैं अर्थात जीवन शून्य |
फिर .......? अग्नि ही जीवन है ..........क्यों नहीं ?
ऐसे ही आकाश मे सब समाहित हैं किसी भी वस्तु , विषय को ग्रहण करने के लिए आकाश अर्थात space बहुत आवश्यक है | अगर आपके पास जगह या  space ही नहीं तो कुछ भी नहीं | जैसे घर बनाने के लिया सबसे पहली शर्त जगह / स्थान है वैसे ही शरीर बनाने के लिए आकाश |
फिर ..:आकाश ही जीवन है ...........क्यों नहीं ?
चलिए मान लेते हैं सब का अपना अपना महत्व है सब बराबर हैं | शरीर पृथ्वी जल वायु आकाश अग्नि सब तत्वों के यथोचित सुमेल से बना है |
तो.........?
क्या सब मिल कर भी जीवन है ?
नहीं ____ क्योंकि अगर शरीर मे आत्मा ही नहीं तो जीवन ही नहीं
अर्थात .....आत्मा ही है जो शरीर में विद्यमान सब तत्वों को प्रेरित करती है अपना कार्य करने के लिए
तो फिर ये क्यों नहीं कहा कि
आत्मा ही जीवन है
वास्तव मे जीवन तो इन पांच तत्वों और आत्मा के समुचित संयोग और सुमेल से बना है |
तभी तो कहा गया है ___________
पृथ्वी है तो जीवन है
जल है तो जीवन है
अग्नि है तो जीवन है
वायु है तो जीवन है
आकाश है तो जीवन है
आत्मा है तो जीवन है
और यही सत्य भी है ........अर्थात इनमे से किसी एक को निकाल दो तो जीवन नहीं है |
फिर प्रश्न उठता है कि ऐसा क्यों बोला गया कि
जल ही जीवन है
जैसा कि मैंने शुरू मे कहा कि भारतीय संस्कृति में प्रतीकों का बड़ा महत्व है और वो सार्थक अर्थ भी रखते हैं |
इसी लिए प्रतीक रूप मे कहा गया जल ही जीवन है अपने आप मे एक सार्थकता लिए हुए है |
जैसे कि जीवन को चलायमान कहा है और जीवन को चक्र के साथ जोड़ कर जीवन चक्र की संज्ञा दी गयी है |
जल को अपने इन्ही गुणों के कारण व्यक्ति के जीवन चक्र से जोड़ा गया है |
चक्र मे कहीं से भी शुरू करके वापिस वहीं पहुंचेंगे , जैसे वर्षा जल पृथ्वी गिरता है पहाड़ों पर गिरता है बर्फ का स्थूल रूप लेता है , सूर्य की गर्मी से पिघल कर नदियों के रूप मे विभिन्न पडावों से गुजरता है |
पहाड़ों से मैदान , मैदानों से समुद्र मे जा मिलता है |जैसे जल की यात्रा समाप्त सी हो गयी | जीवन चक्र मे भी व्यक्ति पैदा होकर विभिन्न चरणों से निकल कर अन्त मे मृत्यु को प्राप्त कर के अपनी यात्रा समाप्त करता है |
परन्तु क्या वास्तव मे जल की यात्रा और जीवन यात्रा समाप्त होती है ?
जिस प्रकार मृत्यु के पश्चात आत्मा परमात्मा मे मिलती है और उसी परमात्मा से  आत्मा  मृत्यु लोक में आकर पुनः अपना जीवन चक्र चलाती है |उसी तरह जल भी समुद्र मे मिलता है फिर पुनः वाष्पीकृत होकर पर्वतों की और रुख करता है स्थूल रूप धारण करता है | अग्नि के संयोग से नीचे आता है |
जैसे जल कभी रुकता नहीं वैसे जीवन भी कभी रुकता नहीं | जल के मार्ग में रुकावटें भी आती हैं | पहाड़ों से गिरते नदियों के जल को बाँध कर हम असीम ऊर्जा प्राप्त करते हैं |परन्तु जल की ऊर्जा कम नहीं होती | ऐसे ही जीवन मार्ग मे आने वाली बाधाओं को हम सकारात्मक लेते हुए जब उस से ऊर्जा प्राप्त करते हैं तो उस ऊर्जा का प्रयोग अपने लिए और समाज के लिए करते हैं |
जल कई बार विध्वंस भी करता है ( बाढ़ आदि) ऐसे ही जब जीवन मे जब क्रोध आदि आता आता है तो विध्वंसात्मक प्रवृतियाँ हावी हो कर जीवन नष्ट कर देती है |
चलती तो पृथ्वी भी है परन्तु उसके चलने की प्रक्रिया सतत और एक जैसी है |जीवन मे भी यदि एकरसता हो निर्बाध हो तो जीवन मे मजा नहीं होता जीवन जीवन नहीं होता | जीवन तो जल की तरह उबड खाबड उतर चढ़ाव के बीच मे से रास्ता बनाते हुए चलने का नाम है |
वायु में भी तो उतार चढ़ाव हैं लेकिन वायु में निरंतरता नहीं अस्तव्यस्त , अगर जीवन भी वायु की तरह हो कभी इधर कभी उधर कभी स्तब्ध तो कभी तेज तो जीवन बेकार | वायु की कोई मंजिल भी नहीं | जीवन और जल की मंजिल निश्चित है | जैसे मृत्यु निश्चित है और मृत्यु के बाद पुनः जन्म इसका चक्र है उसी तरह जल चक्र है |
वायु हमे मरता दीखता नहीं , जल दीखता है
वास्तव मे तो जल भी नहीं मरता | समुद्र तो उसके जीवन चक्र का एक पड़ाव है | ऐसे ही व्यक्ति/आत्मा के जीवन चक्र का एक पड़ाव है मृत्यु |
कहते हैं कि जीवन रुकता नहीं और जल भी रुकता नहीं ........यह सत्य है
फिर कहा गया _ जल जब ठहर जाता है तो वह खराब हो जाता है अर्थात उसमे सडांध पैदा हो जाती है | ऐसे ही व्यक्ति जब अकर्मण्य होता है तो उसका जीवन बेकार माना जाता है |
सत्य है दोनों के बारे मे ,परन्तु यह भी कह दिया कि जल और जीवन रुकते नहीं | वास्तव मे रुकते नहीं | जलाशय का जल रुका हुआ भी सतत वाष्पीकृत होता रहता है और पुनः वायुमंडल मे जाकर पहाड़ों नदियों से होता हुआ समुद्र तक की अपनी यात्रा को पूरी करने का प्रयास करता है |
जिस प्रकार जल मे विभिन्न प्रकार के उतार चढ़ाव आते है | रास्ते मे जल को दूषित / मलिन भी किया जाता है
परन्तु समुद्र मे मिलते हुए अपने मे समाहित गंदगी को छोड़ वह पुनः निर्मल हो जाता है |
तभी तो जल को निर्मल कहा गया है | ऐसे ही व्यक्ति से अपेक्षा रहती है कि जीवन चक्र मे विभिन्न प्रकार से उतार चढ़ाव गंदगी आदि से अपने मन और आत्मा को दूषित किये बिना निर्मल ह्रदय से परमात्मा से मिलन करे |
जैसे अग्नि के संयोग से कोई वस्तु जलते हुए राख हो जाती है और उसमे से उसका जलीयांश  वाष्पीकृत होकर मरता नहीं | उसी प्रकार जीवन यात्रा पूरी करने के बाद शरीर जलाया जाता है तो आत्मा मरता नहीं अपितु निर्मल और निष्पाप होकर परमात्मा से मिल कर पुनः जीवन चक्र में आने को तैयार होता है |
अतः
जल ही जीवन है 

Friday, December 23, 2011



एक संघर्ष पुरुष  
 

 शहीद राष्ट्र योद्धा
 डा॰धर्मवीर सिंह जी भाटिया  
   हे मातृभूमि के अमर पुत्र    
शत शत श्रद्धांजलि नमस्कार
कितनी दृढ़ता कितना साहस  कितनी अपार सकंल्प शक्ति
कितना पौरुष कितने कर्मठ  कितनी नस नस में राष्ट्र भक्ति
अनुमान न कोई कर पाया  तुम थे कितने निर्भय उदार

एक संघर्ष पुरुष  
जन्म और मृत्यु शाश्वत सत्य है l ये मानव की जीवन यात्रा की परिधि बांधने वाले शब्द हैं जिनकी सीमित परिधि के भीतर मनुष्य अपनी इस जीवन यात्रा की सार्थकता का संघर्ष करता है l इस संघर्ष के कारण ही मानव अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाता है l जीवन संघर्ष में कोई जितना ही सफल होता है उतनी ही वह एक छाप दुनिया में छोड़ता है l  जिस व्यक्तित्व का जीवन जितना संघर्षमय रहता है, जितनी मात्रा में वह संघर्ष का सहर्ष सामना करता हुआ साफ्लता प्राप्त करता है उस व्यक्तित्व का उतना ही महान् सन्देश आने वाली पीढ़ियों को मिलता है l इस संघर्षमयी जीवन यात्रा में अनेक कटु एवं विषादपूर्ण क्षण आते हैं, अनेक निराशा व पराजय के पल आते हैं परन्तु जो पुरुष इन कटु और निराशा के क्षणों में अविचल रहता हुआ अपने लक्ष्य की प्राप्ति हेतु संघर्षरत रहता है निरंतर कर्मशील रहता है वही अपने जीवन की सार्थकता को वास्तव में सिद्ध कर पाता है .....और शहीद डा.धर्मवीर सिंह भाटिया इस अर्थ में अपने जीवन को पूर्ण सार्थक सिद्ध करने वाले कर्मयोद्धा थे और फिर जो कर्मयोद्धा जीवन के रण संग्राम में साक्षात् जूझता हुआ वीरगति को प्राप्त हो उस कर्मयोद्धा की शहादत से आने वाली पीढ़ियां सदा प्रेरणा लेती रहेंगी l
डा.धर्मवीर सिंह जी भाटिया का जन्म 1 अप्रैल 1935 को शुजाबाद जिला मुल्तान( अब पकिस्तान) में श्री धर्मचंद भाटिया व श्रीमती राम्रक्खी के घर हुआ l आप दो भाइयों व चार बहनों में सबसे बड़े थे l आप अभी बारह वर्ष के ही थे कि भारत विभाजन के कारण शुजाबाद छोड़ कर 1947 में जैतो आ गए l तब से अंत तक जैतो ही आपकी कर्मस्थली रही l  बचपन से ही स्वाभिमानी धर्मवीर जी ने विभाजन के पश्चात जैतो में पहुँच कर शरणार्थियों के लिए लगे हुए शिविर में भोजन करने के बजाए दिहाड़ी कर ईंटे उठा कर जो पैसे प्राप्त हुए उसी से भोजन किया l यह क्रम किशोर धर्मवीर भाटिया अनेक दिन तक दोहराता रहा l फिर जिस धर्मशाला में आप अपने माता पिता व बहनों के साथ रहते थे उसे खाली करवा लेने के कारण आप जैतो गांव चले गए वहाँ पर आपने जीविकोपार्जन के लिए घर पर दाल के पापड़ बना कर बेचने का काम किया l अभाव में बीत रहे बचपन में ही किशोर धर्मवीर संकल्प का धनी बना l कड़ा परिश्रम करते हुए परिवार के लिए दो जून भोजन स्वाभिमान पूर्वक जुटाया परन्तु किसी से याचना नहीं की l उनकी यह स्वाभिमानी वृत्ति उनके जीवन में बार बार दिखाई देती है l स्वाभिमान का यह भाव ही उनकी संघर्ष शक्ति और अपराजेय संकल्प शक्ति का मूल बना जो जीवन भर डा. भाटिया जी का स्वभाव बन कर रह गया l यह डा. भाटिया की संकल्प शक्ति का ही प्रमाण था कि 1952 में अपने जीवन की संघर्ष यात्रा में रूड़की शहर में एक वर्ष तक रिक्शा भी चलाया l किशोर आयु में रिक्शा चलाते हुए जो पसीना बहा उसने इस कर्मयोद्धा की कर्मशक्ति को और भी दृढ किया l अभाव में बीते बचपन में आपने लेम्प पोल के नीचे बैठ कर अपनी प्रारंभिक शिक्षा पूरी की और पैसे जुड़ने पर लैम्प ख़रीदा l झुकने और पराजय स्वीकार करने की अपेक्षा दृढ़ता से किसी भी चुनौती का सामना करने का अदम्य साहस आपमें था l सन 1953 में पटवारी की ट्रेनिंग 7 माह पश्चात सिर्फ इस लिए बीच में छोड़ कर आ गए कि पटवारी की नौकरी करते हुए उन्हें किसानों से उगाही के लिए किस किस तरह के हथकंडे अपनाने पडेंगे यह जान कर उन्हें इस नौकरी से ही विरक्ति हो गयी तथा अंतरात्मा की प्रेरणा से इस नौकरी को ठुकरा कर युवा धर्मवीर ने पुनः संघर्ष का मार्ग अपनाया l जो बात सिद्धांत और मूल्यों के ह्रास का कारण बने वह उनकी अंतरात्मा को कभी नहीं जची l और फिर उसे न करने से चाहे कितना ही नुकसान क्यों ना उठाना पड़े,डा. भाटिया जी ने इसकी कभी परवाह नहीं की l डा. भाटिया जी ने इसके पश्चात टोहाना(जिला फतेहाबाद) के क्षेत्र में डाकिये के नाते एक वर्ष के लगभग नौकरी की इस समय आपके पास साइकिल तक ना था , पैदल ही डाक बांटते हुए आपने अपनी पढाई भी जारी रखी l गाँव गाँव पैदल घूम कर, अनेक बार भूखे रह कर भी इस संघर्ष पुरुष ने इतने अभावों के बीच भी अपनी महत्वाकांक्षा को और कुछ कर गुजरने की तमन्ना को जीवित रखा l 1955 से आपने कुछ समय के लिए गांव महमासरजा जिला बठिंडा में हिंदी शिक्षक के नाते भी कार्य किया l
डा.धर्मवीर जी ने औपचारिक रूप से शिक्षण जैतो के एच एस एन हाई स्कूल में मेट्रिक पास की और 1954 में प्रभाकर करने के बाद एफ ए की और 1959 में आपने आयुर्वेद विशारद करने के बाद 1962में स्वतंत्र रूप से आयुर्वेद की प्रेक्टिस शुरू की l गहन स्वाध्याय शील वृत्ति के चलते और कुछ नया कर दिखाने की प्रबल इच्छा से ही उन्होंने आयुर्वेद का गम्भीर अध्ययन किया और आयुर्वेद के क्षेत्र में आपने अपने ही अनेक योग तैयार किये जिनसे उन्होंने विभिन्न कष्टसाध्य और दीर्घकालिक रोगों से ग्रस्त अनेक रोगियों को रोग मुक्त किया l
सामजिक राजनैतिक जीवन .. डा. धर्मवीर जी 1948 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सम्पर्क में आये और आजीवन एक निष्ठावान प्रतिज्ञत स्वयंसेवक की तरह संघमय रहे | आप 1952 में जनसंघ की स्थापना के पश्चात राजनीति में भी सक्रिय हुए | राजनीति में सक्रिय रहते हुए आपने अनेक आंदोलनों में भाग लिया तथा अनेक बार जेल भी गए | 1975 में आपातकाल में आपने छः मास कारावास में बिताए | राजनीतिक जीवन में आप जनसंघ नगर सचिव से लेकर जनसंघ के बठिंडा जिला महासचिव रहे तत्पश्चात फरीदकोट के जिला जनसंघ अध्यक्ष रहे व जनता पार्टी बनने के पश्चात उसके पहले जिला संयोजक बने | अपनी शहादत के समय आप भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश सचिव थे | आप लंबे समय तक जिला शिकायत व विकास समिति के सदस्य भी रहे |
राजनैतिक जीवन में आपके जीवन की एक घटना उल्लेखनीय है आपातकाल के पश्चात सन
1977 में भारतीय जनसंघ के दिल्ली पूर्ण अधिवेषण में जनसंघ के जनता पार्टी में विलय के प्रस्ताव का प्रतिवाद करते हुए कहा था
 “ दीपक को सम्भाल कर रखें –अँधेरा फिर आ सकता है ``”
उन्होंने यह इस संदर्भ में कहा था कि तब कहा जा रहा था कि अब सूर्योदय हो चुका है अतः दीपक की आवश्यकता नहीं रही ( जनसंघ का चुनाव चिन्ह तब दीपक था ) परन्तु बाद की घटनाओं ने यह साबित किया कि डा. भाटिया की सोच सही थी |

स्नेह, सादगी, अपनत्व की प्रतिमूर्ति डा. धर्मवीर सिंह जी अगाध प्रेम के सागर थे | कोई पूंजीपति न होते हुए भी आपकी आतिथ्य भावना वास्तव में ही अविस्मरणीय थी | डाक्टर जी स्वगतशीलता ,स्नेह व अपनत्व से परिपूर्ण तो थी ही साथ ही इस स्वागतशीलता में कोई बनावटीपन न था | कोई भी आये बड़ा या छोटा अमीर या गरीब प्रत्येक का मधुरतापूर्वक स्वागत करना उनका सह्ज स्वभाव था | किसी के मिलने पर जो आनंद मुस्कुराहट बन कर उनके चेहरे से निसृत होता था और स्नेहपूर्वक जो अपनापन उनकी आँखों में चमक बन कर प्रकट होता था वह उनके मिलने वालों को कभी न भूलेगा | सादा किन्तु अत्यन्त अपनत्वपूर्ण उनके स्वागत और आतिथ्य को जिस जिसने चखा है उसे वह चौड़े ललाट वाला, गम्भीर तेज युक्त चेहरा कैसे भूल सकता है |
यह कोई प्रशंसा मात्र नहीं वरन्
उनके अपनत्व की स्निग्धता का अनुभव कर चुके एक स्नेहपात्र का हृदयोद्गार है

डाक्टर जी की मित्रता की परिधि की सीमा न थी – समविचारक से लेकर विरोधी विचार वाले कम्युनिस्ट से लेकर अकाली तक हर विचार का व्यक्ति उनका मित्र था | प्रत्येक को लगता था कि “ मैं डाक्टर भाटिया जी का खास हूँ –डाक्टर जी मुझे ही अधिक चाहते हैं |” वास्तव में यही उनके व्यक्तित्व की महानता का दर्शन है उनका स्नेह सभी राजनैतिक,सामाजिक,वैचारिक और धार्मिक भेदों से कहीं ऊँचा था |आप वास्तव में अजातशत्रु थे और अजातशत्रु बनना ही तो आपने परम पूजनीय डा. केशव राव हेडगेवार के जीवन से सीखा था |
अभाव व कष्ट बड़ों बड़ों को अपने मार्ग में ही विश्राम करने को बाध्य कर देते हैं | गरीबी व भूख की तपिश अनेक महत्वाकांक्षियों की महत्वाकांक्षा को राख कर देती है परन्तु यह धर्मवीर था ही किसी और मिटटी का बना | आपके जीवन की यह विशेषता है कि दिहाड़ी पर मजदूरी करने से लेकर पापड़ बेचने और रिक्शा चलाने से लेकर डाकिया बनने तक अनेक उतार चढ़ाव आपके जीवन में आये पर इस संघर्ष पुरुष की संकल्प शक्ति की अदम्यता का दमन नहीं हो सका – इसी अपराजेय संकल्प शक्ति ने इस पुरुष को संघर्ष पुरुष बनाया |
श्रीमद्भगवत् गीता और सुखमनी साहिब का पाठ करने वाले डा. धर्मवीर जी एक उच्च कोटि के आध्यात्मिक रूचि सम्पन्न व्यक्ति थे |अपने जीवन में आपने उपनिषद के इस उद्घोष को साक्षात् अंगीकार किया था कि सोया हुआ मनुष्य कलियुग का , आलस्यग्रस्त मनुष्य द्वापर का,खड़ा हुआ मनुष्य त्रेता का और कर्मरत मनुष्य सतयुग का निर्माता होता है , अतः चलते रहो हलते रहो | “चरैवेति चरैवेति” यह संदेश आपकी जीवन गाथा से ही मिलता है |डाक्टर जी आजन्म इसे आत्मसात करके कर्मरत रहे |
अपने देश की मिटटी से अगाध प्रेम करने वाले,अपनी संस्कृति के प्रति अटूट आस्था रखने वाले,भारतीय जीवन मूल्यों के प्रति अत्यन्त श्रद्धावान डाक्टर भाटिया जी भारतीय संस्कृति के महान पुजारी थे |मातृभूमि के प्रति समर्पण और राष्ट्रभक्ति आपमें कूट कूट कर भरी हुई थी | भारत मां के प्रति पूज्य भाव उनके रक्त में ही था इसीलिए यह स्वाभिमानी संघर्ष पुरुष काफी समय अनेक प्रकार की धमकियां मिलने के बावजूद भी अपनी कर्मभूमि को समरांगण मान कर एक योद्धा की भांति डटा रहा | जब तक शरीर में प्राण हैं, मातृ भूमि का मान रखूँगा अपने इस संकल्प के प्रति दृढ संकल्प होने के कारण ही यह संघर्ष पुरुष 23 दिसम्बर 1990  को देशद्रोहियों की गोली का शिकार हुआ |
नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे
त्वया हिन्दुभूमे सुखं वर्धितो
ऽहम्
महामंगले पुण्यभूमे त्वदर्थे
पतत्वेष कायो नमस्ते नमस्ते
 
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा में बोली जाने वाली इस प्रार्थना की यह भावना कि “हे महामंगल करने वाली पुण्यभूमि(जन्मभूमि)तेरे हित के लिए मेरा यह शरीर काम आये”- इसको डाक्टर भाटिया जी ने अपने जीवन मे चरितार्थ करके दिखा दिया |
इस संघर्ष पुरुष को,राष्ट्र धर्म योद्धा को,राष्ट्रीय एकता संग्राम में बलिदान हुए अमर सेनानी को कोटि कोटि प्रणाम | भारतमाता के महान सपूत डा. धर्मवीर सिंह भाटिया को शत शत नमन |