एक संघर्ष पुरुष
शहीद राष्ट्र योद्धा
डा॰धर्मवीर सिंह जी भाटिया
हे मातृभूमि के अमर पुत्र
शत शत श्रद्धांजलि नमस्कार
कितनी दृढ़ता कितना साहस कितनी अपार सकंल्प शक्ति
कितना पौरुष कितने कर्मठ कितनी नस नस में राष्ट्र भक्ति
अनुमान न कोई कर पाया तुम थे कितने निर्भय उदार
अनुमान न कोई कर पाया तुम थे कितने निर्भय उदार
एक संघर्ष पुरुष
जन्म और मृत्यु शाश्वत सत्य है l ये मानव की जीवन यात्रा की परिधि बांधने वाले शब्द हैं जिनकी सीमित परिधि के भीतर मनुष्य अपनी इस जीवन यात्रा की सार्थकता का संघर्ष करता है l इस संघर्ष के कारण ही मानव अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाता है l जीवन संघर्ष में कोई जितना ही सफल होता है उतनी ही वह एक छाप दुनिया में छोड़ता है l जिस व्यक्तित्व का जीवन जितना संघर्षमय रहता है, जितनी मात्रा में वह संघर्ष का सहर्ष सामना करता हुआ साफ्लता प्राप्त करता है उस व्यक्तित्व का उतना ही महान् सन्देश आने वाली पीढ़ियों को मिलता है l इस संघर्षमयी जीवन यात्रा में अनेक कटु एवं विषादपूर्ण क्षण आते हैं, अनेक निराशा व पराजय के पल आते हैं परन्तु जो पुरुष इन कटु और निराशा के क्षणों में अविचल रहता हुआ अपने लक्ष्य की प्राप्ति हेतु संघर्षरत रहता है निरंतर कर्मशील रहता है वही अपने जीवन की सार्थकता को वास्तव में सिद्ध कर पाता है .....और शहीद डा.धर्मवीर सिंह भाटिया इस अर्थ में अपने जीवन को पूर्ण सार्थक सिद्ध करने वाले कर्मयोद्धा थे और फिर जो कर्मयोद्धा जीवन के रण संग्राम में साक्षात् जूझता हुआ वीरगति को प्राप्त हो उस कर्मयोद्धा की शहादत से आने वाली पीढ़ियां सदा प्रेरणा लेती रहेंगी l
डा.धर्मवीर सिंह जी भाटिया का जन्म 1 अप्रैल 1935 को शुजाबाद जिला मुल्तान( अब पकिस्तान) में श्री धर्मचंद भाटिया व श्रीमती राम्रक्खी के घर हुआ l आप दो भाइयों व चार बहनों में सबसे बड़े थे l आप अभी बारह वर्ष के ही थे कि भारत विभाजन के कारण शुजाबाद छोड़ कर 1947 में जैतो आ गए l तब से अंत तक जैतो ही आपकी कर्मस्थली रही l बचपन से ही स्वाभिमानी धर्मवीर जी ने विभाजन के पश्चात जैतो में पहुँच कर शरणार्थियों के लिए लगे हुए शिविर में भोजन करने के बजाए दिहाड़ी कर ईंटे उठा कर जो पैसे प्राप्त हुए उसी से भोजन किया l यह क्रम किशोर धर्मवीर भाटिया अनेक दिन तक दोहराता रहा l फिर जिस धर्मशाला में आप अपने माता पिता व बहनों के साथ रहते थे उसे खाली करवा लेने के कारण आप जैतो गांव चले गए वहाँ पर आपने जीविकोपार्जन के लिए घर पर दाल के पापड़ बना कर बेचने का काम किया l अभाव में बीत रहे बचपन में ही किशोर धर्मवीर संकल्प का धनी बना l कड़ा परिश्रम करते हुए परिवार के लिए दो जून भोजन स्वाभिमान पूर्वक जुटाया परन्तु किसी से याचना नहीं की l उनकी यह स्वाभिमानी वृत्ति उनके जीवन में बार बार दिखाई देती है l स्वाभिमान का यह भाव ही उनकी संघर्ष शक्ति और अपराजेय संकल्प शक्ति का मूल बना जो जीवन भर डा. भाटिया जी का स्वभाव बन कर रह गया l यह डा. भाटिया की संकल्प शक्ति का ही प्रमाण था कि 1952 में अपने जीवन की संघर्ष यात्रा में रूड़की शहर में एक वर्ष तक रिक्शा भी चलाया l किशोर आयु में रिक्शा चलाते हुए जो पसीना बहा उसने इस कर्मयोद्धा की कर्मशक्ति को और भी दृढ किया l अभाव में बीते बचपन में आपने लेम्प पोल के नीचे बैठ कर अपनी प्रारंभिक शिक्षा पूरी की और पैसे जुड़ने पर लैम्प ख़रीदा l झुकने और पराजय स्वीकार करने की अपेक्षा दृढ़ता से किसी भी चुनौती का सामना करने का अदम्य साहस आपमें था l सन 1953 में पटवारी की ट्रेनिंग 7 माह पश्चात सिर्फ इस लिए बीच में छोड़ कर आ गए कि पटवारी की नौकरी करते हुए उन्हें किसानों से उगाही के लिए किस किस तरह के हथकंडे अपनाने पडेंगे यह जान कर उन्हें इस नौकरी से ही विरक्ति हो गयी तथा अंतरात्मा की प्रेरणा से इस नौकरी को ठुकरा कर युवा धर्मवीर ने पुनः संघर्ष का मार्ग अपनाया l जो बात सिद्धांत और मूल्यों के ह्रास का कारण बने वह उनकी अंतरात्मा को कभी नहीं जची l और फिर उसे न करने से चाहे कितना ही नुकसान क्यों ना उठाना पड़े,डा. भाटिया जी ने इसकी कभी परवाह नहीं की l डा. भाटिया जी ने इसके पश्चात टोहाना(जिला फतेहाबाद) के क्षेत्र में डाकिये के नाते एक वर्ष के लगभग नौकरी की इस समय आपके पास साइकिल तक ना था , पैदल ही डाक बांटते हुए आपने अपनी पढाई भी जारी रखी l गाँव गाँव पैदल घूम कर, अनेक बार भूखे रह कर भी इस संघर्ष पुरुष ने इतने अभावों के बीच भी अपनी महत्वाकांक्षा को और कुछ कर गुजरने की तमन्ना को जीवित रखा l 1955 से आपने कुछ समय के लिए गांव महमासरजा जिला बठिंडा में हिंदी शिक्षक के नाते भी कार्य किया l
डा.धर्मवीर जी ने औपचारिक रूप से शिक्षण जैतो के एच एस एन हाई स्कूल में मेट्रिक पास की और 1954 में प्रभाकर करने के बाद एफ ए की और 1959 में आपने आयुर्वेद विशारद करने के बाद 1962में स्वतंत्र रूप से आयुर्वेद की प्रेक्टिस शुरू की l गहन स्वाध्याय शील वृत्ति के चलते और कुछ नया कर दिखाने की प्रबल इच्छा से ही उन्होंने आयुर्वेद का गम्भीर अध्ययन किया और आयुर्वेद के क्षेत्र में आपने अपने ही अनेक योग तैयार किये जिनसे उन्होंने विभिन्न कष्टसाध्य और दीर्घकालिक रोगों से ग्रस्त अनेक रोगियों को रोग मुक्त किया l
सामजिक राजनैतिक जीवन .. डा. धर्मवीर जी 1948 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सम्पर्क में आये और आजीवन एक निष्ठावान प्रतिज्ञत स्वयंसेवक की तरह संघमय रहे | आप 1952 में जनसंघ की स्थापना के पश्चात राजनीति में भी सक्रिय हुए | राजनीति में सक्रिय रहते हुए आपने अनेक आंदोलनों में भाग लिया तथा अनेक बार जेल भी गए | 1975 में आपातकाल में आपने छः मास कारावास में बिताए | राजनीतिक जीवन में आप जनसंघ नगर सचिव से लेकर जनसंघ के बठिंडा जिला महासचिव रहे तत्पश्चात फरीदकोट के जिला जनसंघ अध्यक्ष रहे व जनता पार्टी बनने के पश्चात उसके पहले जिला संयोजक बने | अपनी शहादत के समय आप भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश सचिव थे | आप लंबे समय तक जिला शिकायत व विकास समिति के सदस्य भी रहे |
राजनैतिक जीवन में आपके जीवन की एक घटना उल्लेखनीय है आपातकाल के पश्चात सन 1977 में भारतीय जनसंघ के दिल्ली पूर्ण अधिवेषण में जनसंघ के जनता पार्टी में विलय के प्रस्ताव का प्रतिवाद करते हुए कहा था
“ दीपक को सम्भाल कर रखें –अँधेरा फिर आ सकता है ``”
उन्होंने यह इस संदर्भ में कहा था कि तब कहा जा रहा था कि अब सूर्योदय हो चुका है अतः दीपक की आवश्यकता नहीं रही ( जनसंघ का चुनाव चिन्ह तब दीपक था ) परन्तु बाद की घटनाओं ने यह साबित किया कि डा. भाटिया की सोच सही थी |
स्नेह, सादगी, अपनत्व की प्रतिमूर्ति डा. धर्मवीर सिंह जी अगाध प्रेम के सागर थे | कोई पूंजीपति न होते हुए भी आपकी आतिथ्य भावना वास्तव में ही अविस्मरणीय थी | डाक्टर जी स्वगतशीलता ,स्नेह व अपनत्व से परिपूर्ण तो थी ही साथ ही इस स्वागतशीलता में कोई बनावटीपन न था | कोई भी आये बड़ा या छोटा अमीर या गरीब प्रत्येक का मधुरतापूर्वक स्वागत करना उनका सह्ज स्वभाव था | किसी के मिलने पर जो आनंद मुस्कुराहट बन कर उनके चेहरे से निसृत होता था और स्नेहपूर्वक जो अपनापन उनकी आँखों में चमक बन कर प्रकट होता था वह उनके मिलने वालों को कभी न भूलेगा | सादा किन्तु अत्यन्त अपनत्वपूर्ण उनके स्वागत और आतिथ्य को जिस जिसने चखा है उसे वह चौड़े ललाट वाला, गम्भीर तेज युक्त चेहरा कैसे भूल सकता है |
यह कोई प्रशंसा मात्र नहीं वरन् उनके अपनत्व की स्निग्धता का अनुभव कर चुके एक स्नेहपात्र का हृदयोद्गार है
डाक्टर जी की मित्रता की परिधि की सीमा न थी – समविचारक से लेकर विरोधी विचार वाले कम्युनिस्ट से लेकर अकाली तक हर विचार का व्यक्ति उनका मित्र था | प्रत्येक को लगता था कि “ मैं डाक्टर भाटिया जी का खास हूँ –डाक्टर जी मुझे ही अधिक चाहते हैं |” वास्तव में यही उनके व्यक्तित्व की महानता का दर्शन है उनका स्नेह सभी राजनैतिक,सामाजिक,वैचारिक और धार्मिक भेदों से कहीं ऊँचा था |आप वास्तव में अजातशत्रु थे और अजातशत्रु बनना ही तो आपने परम पूजनीय डा. केशव राव हेडगेवार के जीवन से सीखा था |
अभाव व कष्ट बड़ों बड़ों को अपने मार्ग में ही विश्राम करने को बाध्य कर देते हैं | गरीबी व भूख की तपिश अनेक महत्वाकांक्षियों की महत्वाकांक्षा को राख कर देती है परन्तु यह धर्मवीर था ही किसी और मिटटी का बना | आपके जीवन की यह विशेषता है कि दिहाड़ी पर मजदूरी करने से लेकर पापड़ बेचने और रिक्शा चलाने से लेकर डाकिया बनने तक अनेक उतार चढ़ाव आपके जीवन में आये पर इस संघर्ष पुरुष की संकल्प शक्ति की अदम्यता का दमन नहीं हो सका – इसी अपराजेय संकल्प शक्ति ने इस पुरुष को संघर्ष पुरुष बनाया |श्रीमद्भगवत् गीता और सुखमनी साहिब का पाठ करने वाले डा. धर्मवीर जी एक उच्च कोटि के आध्यात्मिक रूचि सम्पन्न व्यक्ति थे |अपने जीवन में आपने उपनिषद के इस उद्घोष को साक्षात् अंगीकार किया था कि सोया हुआ मनुष्य कलियुग का , आलस्यग्रस्त मनुष्य द्वापर का,खड़ा हुआ मनुष्य त्रेता का और कर्मरत मनुष्य सतयुग का निर्माता होता है , अतः चलते रहो हलते रहो | “चरैवेति चरैवेति” यह संदेश आपकी जीवन गाथा से ही मिलता है |डाक्टर जी आजन्म इसे आत्मसात करके कर्मरत रहे |
अपने देश की मिटटी से अगाध प्रेम करने वाले,अपनी संस्कृति के प्रति अटूट आस्था रखने वाले,भारतीय जीवन मूल्यों के प्रति अत्यन्त श्रद्धावान डाक्टर भाटिया जी भारतीय संस्कृति के महान पुजारी थे |मातृभूमि के प्रति समर्पण और राष्ट्रभक्ति आपमें कूट कूट कर भरी हुई थी | भारत मां के प्रति पूज्य भाव उनके रक्त में ही था इसीलिए यह स्वाभिमानी संघर्ष पुरुष काफी समय अनेक प्रकार की धमकियां मिलने के बावजूद भी अपनी कर्मभूमि को समरांगण मान कर एक योद्धा की भांति डटा रहा | जब तक शरीर में प्राण हैं, मातृ भूमि का मान रखूँगा अपने इस संकल्प के प्रति दृढ संकल्प होने के कारण ही यह संघर्ष पुरुष 23 दिसम्बर 1990 को देशद्रोहियों की गोली का शिकार हुआ |
राजनैतिक जीवन में आपके जीवन की एक घटना उल्लेखनीय है आपातकाल के पश्चात सन 1977 में भारतीय जनसंघ के दिल्ली पूर्ण अधिवेषण में जनसंघ के जनता पार्टी में विलय के प्रस्ताव का प्रतिवाद करते हुए कहा था
“ दीपक को सम्भाल कर रखें –अँधेरा फिर आ सकता है ``”
उन्होंने यह इस संदर्भ में कहा था कि तब कहा जा रहा था कि अब सूर्योदय हो चुका है अतः दीपक की आवश्यकता नहीं रही ( जनसंघ का चुनाव चिन्ह तब दीपक था ) परन्तु बाद की घटनाओं ने यह साबित किया कि डा. भाटिया की सोच सही थी |
स्नेह, सादगी, अपनत्व की प्रतिमूर्ति डा. धर्मवीर सिंह जी अगाध प्रेम के सागर थे | कोई पूंजीपति न होते हुए भी आपकी आतिथ्य भावना वास्तव में ही अविस्मरणीय थी | डाक्टर जी स्वगतशीलता ,स्नेह व अपनत्व से परिपूर्ण तो थी ही साथ ही इस स्वागतशीलता में कोई बनावटीपन न था | कोई भी आये बड़ा या छोटा अमीर या गरीब प्रत्येक का मधुरतापूर्वक स्वागत करना उनका सह्ज स्वभाव था | किसी के मिलने पर जो आनंद मुस्कुराहट बन कर उनके चेहरे से निसृत होता था और स्नेहपूर्वक जो अपनापन उनकी आँखों में चमक बन कर प्रकट होता था वह उनके मिलने वालों को कभी न भूलेगा | सादा किन्तु अत्यन्त अपनत्वपूर्ण उनके स्वागत और आतिथ्य को जिस जिसने चखा है उसे वह चौड़े ललाट वाला, गम्भीर तेज युक्त चेहरा कैसे भूल सकता है |
यह कोई प्रशंसा मात्र नहीं वरन् उनके अपनत्व की स्निग्धता का अनुभव कर चुके एक स्नेहपात्र का हृदयोद्गार है
डाक्टर जी की मित्रता की परिधि की सीमा न थी – समविचारक से लेकर विरोधी विचार वाले कम्युनिस्ट से लेकर अकाली तक हर विचार का व्यक्ति उनका मित्र था | प्रत्येक को लगता था कि “ मैं डाक्टर भाटिया जी का खास हूँ –डाक्टर जी मुझे ही अधिक चाहते हैं |” वास्तव में यही उनके व्यक्तित्व की महानता का दर्शन है उनका स्नेह सभी राजनैतिक,सामाजिक,वैचारिक और धार्मिक भेदों से कहीं ऊँचा था |आप वास्तव में अजातशत्रु थे और अजातशत्रु बनना ही तो आपने परम पूजनीय डा. केशव राव हेडगेवार के जीवन से सीखा था |
अभाव व कष्ट बड़ों बड़ों को अपने मार्ग में ही विश्राम करने को बाध्य कर देते हैं | गरीबी व भूख की तपिश अनेक महत्वाकांक्षियों की महत्वाकांक्षा को राख कर देती है परन्तु यह धर्मवीर था ही किसी और मिटटी का बना | आपके जीवन की यह विशेषता है कि दिहाड़ी पर मजदूरी करने से लेकर पापड़ बेचने और रिक्शा चलाने से लेकर डाकिया बनने तक अनेक उतार चढ़ाव आपके जीवन में आये पर इस संघर्ष पुरुष की संकल्प शक्ति की अदम्यता का दमन नहीं हो सका – इसी अपराजेय संकल्प शक्ति ने इस पुरुष को संघर्ष पुरुष बनाया |श्रीमद्भगवत् गीता और सुखमनी साहिब का पाठ करने वाले डा. धर्मवीर जी एक उच्च कोटि के आध्यात्मिक रूचि सम्पन्न व्यक्ति थे |अपने जीवन में आपने उपनिषद के इस उद्घोष को साक्षात् अंगीकार किया था कि सोया हुआ मनुष्य कलियुग का , आलस्यग्रस्त मनुष्य द्वापर का,खड़ा हुआ मनुष्य त्रेता का और कर्मरत मनुष्य सतयुग का निर्माता होता है , अतः चलते रहो हलते रहो | “चरैवेति चरैवेति” यह संदेश आपकी जीवन गाथा से ही मिलता है |डाक्टर जी आजन्म इसे आत्मसात करके कर्मरत रहे |
अपने देश की मिटटी से अगाध प्रेम करने वाले,अपनी संस्कृति के प्रति अटूट आस्था रखने वाले,भारतीय जीवन मूल्यों के प्रति अत्यन्त श्रद्धावान डाक्टर भाटिया जी भारतीय संस्कृति के महान पुजारी थे |मातृभूमि के प्रति समर्पण और राष्ट्रभक्ति आपमें कूट कूट कर भरी हुई थी | भारत मां के प्रति पूज्य भाव उनके रक्त में ही था इसीलिए यह स्वाभिमानी संघर्ष पुरुष काफी समय अनेक प्रकार की धमकियां मिलने के बावजूद भी अपनी कर्मभूमि को समरांगण मान कर एक योद्धा की भांति डटा रहा | जब तक शरीर में प्राण हैं, मातृ भूमि का मान रखूँगा अपने इस संकल्प के प्रति दृढ संकल्प होने के कारण ही यह संघर्ष पुरुष 23 दिसम्बर 1990 को देशद्रोहियों की गोली का शिकार हुआ |
नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे
त्वया हिन्दुभूमे सुखं वर्धितोऽहम्
महामंगले पुण्यभूमे त्वदर्थे
पतत्वेष कायो नमस्ते नमस्ते
त्वया हिन्दुभूमे सुखं वर्धितोऽहम्
महामंगले पुण्यभूमे त्वदर्थे
पतत्वेष कायो नमस्ते नमस्ते
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा में बोली जाने वाली इस प्रार्थना की यह भावना कि “हे महामंगल करने वाली पुण्यभूमि(जन्मभूमि)तेरे हित के लिए मेरा यह शरीर काम आये”- इसको डाक्टर भाटिया जी ने अपने जीवन मे चरितार्थ करके दिखा दिया |
इस संघर्ष पुरुष को,राष्ट्र धर्म योद्धा को,राष्ट्रीय एकता संग्राम में बलिदान हुए अमर सेनानी को कोटि कोटि प्रणाम | भारतमाता के महान सपूत डा. धर्मवीर सिंह भाटिया को शत शत नमन |
इस संघर्ष पुरुष को,राष्ट्र धर्म योद्धा को,राष्ट्रीय एकता संग्राम में बलिदान हुए अमर सेनानी को कोटि कोटि प्रणाम | भारतमाता के महान सपूत डा. धर्मवीर सिंह भाटिया को शत शत नमन |
